हाथ के हुनर से जीवन में रंग बिखेरता हथकरघा
मनीष गोधा

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भारत एक ऐसा देश है जिसकी विविधता के इतने रंग है कि गिनने लगेें तो गिनती भूल जाएं। कहते हैं कि भारत में हर दस कोस पर बोली बदल जाती है, लेकिन आप देखेंगे तो बोली ही नहीं रहन-सहन, खान-पान और कपड़े तक बदल जाते हैं। हमारे यहां बोली से लेकर रहन-सहन और भोजन से लेकर कपड़ों तक सब कुछ एक-दूसरे से अलग और अनोखा है। इस विविधता का ही एक रंग है हैण्डलूम यानी हथकरघा। हमारे देश के लगभग हर प्रांत के वस्त्र विन्यास की अलग परम्परा है और इसका पता चलता है वहां के हाथकरघा उद्योग से। चमचमाते रंगों के साथ आंखों में बस जाने वाली डिजायनें और खूबसूरत बुनावट वाले इन कपड़ों की बात ही कुछ अलग है। चंदेरी का मलमल, वाराणासी का सिल्क, राजस्थान का बंधेज, हैदराबाद के हिमरूस, पंजाब के खेस, असम एवं मणिपुर के फेनेक तथा टोंगम तथा बॉटल डिजायन, मध्य प्रदेश की महेश्वरी साड़ियां और वडोदरा की पटोला, कांचीपुरम का सिल्क, छत्तीसगढ़ एवं असम के कोसा एवं मोगा सिल्क, बंगाल की जामधानी, भागलपुर का सिल्क, ओडिशा के टसर और इकत और ना जाने कितने ही तरह की वैरायटी हमारे देश के हैण्डलूम उद्योग में मौजूद है।

हैण्डलूम हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत है, जिसे हमारे हथकरघा कारीगरों ने सदियों से जीवित रखा है। इसे और आगे बढ़ाने के लिए ही देश की केन्द्र सरकार ने हर वर्ष सात अगस्त को हैण्डलूम दिवस मनाने की घोषणा की थी। यह सिलसिला 2015 से शुरू हुआ था जब 7 अगस्त, 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चेन्नई में मद्रास विश्वविद्यालय के शतवार्षिकी महोत्सव में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का उद्घाटन किया था और फार्म टू फाइबर, फाइबर टू फैब्रिक, फैब्रिक टू फैशन एवं फैशन टू फॉरेन का मंत्र दिया था। इस बार हम सातवां हथकरघा दिवस मनाने जा रहे हैं।

हथकरघा दिवस सात अगस्त को आयोजित किए जाने के पीछे एक ऐतिहासिक कारण है। ब्रिटिश सरकार द्वारा किये गये बंगाल विभाजन के विरोध में वर्ष 1905 में कलकत्ता टाउन हॉल में आजादी के मतवालों ने स्वदेशी आंदोलन शुरू किया था और इसी की स्मृति में 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में चुना गया।

स्वदेशी आंदोलन की सबसे बड़ी पहचान खादी और हथकरघा है और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इसी स्वदेशी आंदोलन को “वोकल फॉर लोकल“ के नारे के साथ आगे बढ़ाया है। वे स्थानीय उत्पादों को आगे बढ़ाने की सशक्त पैरवी करते हैं और हथकरघा उद्योग को देश ही नहीं पूरी दुनिया में पहचान दिलाने, लाखों हथकरघा कारीगरों को बेहतर अवसर देने की दिशा में हथकरघा दिवस एक महत्वपूर्ण आयोजन माना जा सकता है।

हमारे यहां हथकरघा का काम देश के लगभग हर राज्य में है। केन्द्रीय वस्त्र मंत्रालय के आंकडों के अनुसार देश में 31.44 लाख परिवार हथकरघा के काम से जुड़े हुए हैं और 35.22 लाख लोग यह काम कर रहे हैं। इनमें 26.74 लाख बुनकर हैं और 8.48 लाख लोग इसका सहायक काम करने वाले हैं। यह उद्योग इन्हें वर्ष में औसतन 207 दिन रोजगार उपलब्ध कराता है। देश के लगभग सभी राज्यों में हथकरघा उद्योग किसी ना किसी रूप में मौजूद है। क्षेत्रवार बात करें तो देश के सबसे ज्यादा बुनकर पूर्वी राज्यों मंे हैं। यहां कुल 20 लाख 44 हजार बुनकर हैं और इनमें भी सबसे ज्यादा 11 लाख बुनकर असम में हैं। देश के पूर्वी राज्यों में हथकरघा उद्योग के इतने विस्तार का अपना अलग ही महत्व है, क्योंकि यह पूरा क्षेत्र अपनी अलग सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान रखता है। पूर्वी क्षेत्र के अलावा पश्चिमी क्षेत्र में 39 हजार 965, उत्तरी क्षेत्र में 1 लाख 94 हजार 708 और दक्षिणी क्षेत्र में 3 लाख 94 हजार 973 बुनकर हथकरघा उत्पादों का उत्पादन कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश, असम, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, झारखंड और बिहार में आठ मेगा क्लस्टर भी विकसित किए गए हैं। देश के अग्रणी डिजायनरों को उत्पाद विकास एवं बुनकरों को उनके कौशल को उन्नत बनाने के लिए इन क्लस्टरो से जोड़ा गया है।

हथकरघा देश में कपड़ा उत्पादन में लगभग 15 प्रतिशत का योगदान देता है और विश्व में हाथ से बुने हुए 95 प्रतिशत कपड़े भारत के ही होते हैं। इन आंकड़ों से समझा जा सकता है हथकरघा हमारे देश की सांस्कृतिक ही नहीं आर्थिक गतिविधियों में भी किस हद तक रचा-बसा है।

भारत हथकरघा ब्रांड
हथकरघा उद्योग देश के शहरों में नहीं बल्कि गांवों से जुडा है और हथकरघा उद्यमियों की सबसे बडी परेशानी उत्पादों के विपणन की रही है। बेहतरीन डिजाइन और उच्च गुणवत्ता के उत्पादों के बावजूद इन्हें बाजार नहीं मिल पाता है। इसी समस्या को दूर करने के लिए वर्ष 2015 में जब हथकरघा दिवस के आयोजन की शुरूआत हुई थी, उसी दिन प्रधानमंत्री ने हैण्डलूम उत्पादों में ग्राहकों का विश्वास बढ़ाने और सामाजिक एवं पर्यावरण अनुकूलता के अतिरिक्त कच्चा माल, प्रसंस्करण, बुनावट एवं अन्य मानदंडों के लिहाज से उत्पादों की गुणवत्ता का स्तर बनाए रखने के लिए ‘भारत हथकरघा‘ ब्रांड (आईएचबी) भी लांच किया था। आज यह ब्रांड विशिष्ट पहचान बना चुका है। इस ब्रांड के तहत अब तक 184 हैण्डलूम उत्पादों के 1590 रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं। वहीं देश भर मंे 103 रिटेल स्टोर्स के साथ इसकी भागीदारी है और खुद के 25 रिटेल स्टोर्स भी चलाए जा रहे हैं। यही नहीं 28 कपड़ा निर्माताओं को आईएचबी ब्रांड के साथ काम करने की अनुमति दी गई है। इनके अलावा बीबा, पीटर इंग्लेंड और ओनाया जैसे बड़े ब्रांड्स ने हैण्डलूम कपड़ों की अलग रंेंज शुरू की है। ई-कॉमर्स कम्पनियां आज के दौर में विपणन का प्रमुख साधन हैं और इसी को देखते हुए 23 प्रमुख ई-कॉमर्स कम्पनियों के साथ अनुबंध कर हैण्डलूम उत्पादों का विपणन किया जा रहा है। इसके अलावा सरकार खुद भी अपने जीईएम पोर्टल के जरिए हैण्डलूम उत्पादों का विपणन कर रही है। अभी तक 4 हजार से ज्यादा बुनकर इस पोर्टल पर आ चुके हैं। इनके अलावा 38 अर्बन हाट भी देश भर में स्वीकृत की गई है, जिनमें से 33 चल रही है और पांच निर्माणाधीन हैं।

इसके साथ ही हथकरघा कारीगरों पर सस्ती दर पर ऋण उपलब्ध कराए जा रहे हैं । इसी तरह उनके जीवन की सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना सहित विभिन्न योजनाओं का लाभ भी दिया जा रहा है। हथकरघा की विरासत को बनाए रखने के लिए देश भर में स्थित नौ भारतीय हथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थान अगली पीढ़ी को हथकरघा बुनाई में विशिष्ट प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं। यही नहीं हैंडलूम एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ने देश के विभिन्न कोनों से हैंडलूम बुनकरों और निर्यातकों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार से जोड़ने का प्रयास किया है और हैण्डलूम उत्पादों को सामूहिक पहचान देने के लिए हैंडलूम मार्क योजना को डिजिटल किया जा रहा है।

इस बार का आयोजन माई हैण्डलूम, माई प्राइड थीम पर
देश इस बार अपनी आजादी के 75वें वर्ष का जश्न मना रहा है और इसी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बार के हैण्डलूम दिवस को “माई हैण्डलूम माई प्राइड“ के नारे के साथ मनाने का आह्वान किया है। इस अवसर पर तीन हैण्डलूम क्राफ्ट विलेज घोषित किए जाएंगे। इनमें एक केरल के कोवलम में, दूसरा असम के मोहपारा में और तीसरा श्रीनगर के कनिहामा में होगा। इसके अलावा तमिलनाडु के कांचीपुर में डिजाइन रिसर्च सेंटर और छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में बुनकर सेवा केन्द्र के भवन का लोकार्पण भी किया जाएगा।

हथकरथा हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत है और देश के ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार देने वाला दूसरा सबसे उद्योग माना जाता है। हम चाहें अपने रहन-सहन में कितने भी आधुनिक हो जाएं, लेकिन बनारसी, कांजीवरम, कोटा डोरिया या चंदेरी की साड़ी के बिना हमारे जीवन का कोई भी विशिष्ट अवसर पूरा नहीं हो सकता। हथकरघा के प्रति इस लगाव को हमें ना सिर्फ बनाए रखना है, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ी को इस विरासत का महत्व समझाना है, ताकि हमारे वस्त्रों की यह विविधता इसी तरह हमेशा बनी रहे।

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