बिचड़ा बचाने की जुगत में लगे किसान

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  • मात्र तीस फीसदी ही गिर सका है बीज

रिपोर्ट – गौरी शंकर प्रसाद

नालंदा ( बिहार ) – हरनौत प्रखंड में कुल 12 हजार 200 हेक्टेयर में धान की खेती का सरकारी लक्ष्य है। इसके अनुपात में दस फीसदी यानि 1220 हेक्टेयर में बिचड़ा तैयार किया जाता है। पर, अभी तक मात्र तीस फीसदी ही बिचड़ा का काम हो सका है। लगातार बारिश से लगे बिचड़े को बचाने का संकट किसानों के समक्ष उत्पन्न हो गया है।
किसानों की समस्या पर प्रखंड कृषि पदाधिकारी विनय कुमार बताते हैं कि जलजमाव होने पर उसके निकास आदि का काम अंचल के जिम्मे होता है। किधर काटना और किधर पानी निकालना है, यह अंचल संबंधी अधिकारी व कर्मचारी ही तय करते हैं। फिलवक्त बिचड़े बचाने के लिए कोई प्लानिंग नहीं है।
इधर कृषि वैज्ञानिक डॉ उमेश नारायण उमेश ने बताया कि खेतों में जलजमाव है। दो दिनों से मौसम के खुलने से तापमान भी बढ़ रहा है। ऐसे में नमी और ताप से बिचड़े गल जायेंगे।
उन्होंने बताया कि एक से दो दिन में पानी निकल जाता है तो बिचड़ों का नुकसान कम होगा। जबकि दो से तीन दिनों में वह गलना शुरू हो जायेगा। क्योंकि नया अंकुरित पौधा मुलायम होता है।
मंगलवार को आर्द्रा नक्षत्र प्रवेश कर गया। इसके साथ ही अब बीज गिराने में तेजी आने की संभावना है। हालांकि जलजमाव इसमें अड़ंगा डाल सकता है। डॉ उमेश बताते हैं कि मध्यम अवधि के धान का बिचड़ा तैयार करने का समय लगभग समाप्त हो गया है। अब कम अवधि वाले धान का बिचड़ा तैयार करना ही बेहतर होगा। यह 120 से 125 दिन की अवधि का होता है।
जिन किसानों ने बीज गिराया है। उसका अंकुरण हो रहा है। तो पहले किसान उस खेत में जमा पानी निकालने का प्रयास करें। चूंकि धान की खेती का महज दस फीसदी ही बिचड़ा तैयार किया जाता है तो किसान के पास बिचड़े के खेत का पानी निकालने के लिए विकल्प हो सकते हैं।

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